हिंदी साहित्य में दिव्यांग विमर्श की अनुपस्थिति और उसके प्रभाव।


सभी मेरे दिव्यांग मित्रों को दिव्यांग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। हिंदी साहित्य का विद्यार्थी और एक दिव्यांग होने के नाते जब भी मैं हिन्दी साहित्य का अध्धयन करता हूं तो कुछ प्रश्न मुझे लगातार बेचैन करते हैं और मैं इनके जवाब तलाशने का प्रयास करता हूं। 


जब हम हिन्दी साहित्य को देखते हैं तो पाते हैं कि अब तक इसमें दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श और अल्पसंख्य विमर्श सम्मिलित किया जा चुका है लेकिन अब तक इसमें दिव्यांग विमर्श सम्मिलित नहीं किया गया। आखिर क्यों?, क्या आज तक हिंदी भाषा में दिव्यांग लेखकों ने अपनी भावनाएं पीड़ा दुखों सामाजिक तिरस्कार आर्थिक अभाव आदि दिव्यांग विषयों पर रचनाएं नहीं की, जवाब है रचनाएं की गई हैं और ये रचनाएं हजारों में हैं। अब प्रश्न उठता है कि तो फिर दिव्यांग विमर्श साहित्य कि मुख्य धारा का हिस्सा क्यों नहीं बना अभी तक तो मुझे लगता है कि अभी तक दिव्यांग रचनाओं ने एक जुट होकर कोई आंदोलन नहीं प्रारंभ किया जिस तरह से दलित लेखकों ने किया था। 


अब यदि बात की जाए की साहित्य की मुख्य धारा में दिव्यांग विमर्श के ना होने से क्या फर्क पड़ता है आखिर आरक्षण तो मिला है ना। हां ये सही है कि आरक्षण मिला है अब कि परिस्थिति के अनुसार नाकाफी है पर जो कुछ भी है मिला तो है पर बात सारी आरक्षण भर कि नहीं है बात है सामाजिक स्वीकार्यता की सामान्य लोगों के दिव्यांगो के प्रति नजरिये की। जब दलित विमर्श साहित्य का हिस्सा बना तो इसने समाज में दलितों के प्रति लोगों के नजरिये को बदल दिया लोग उन्हें सहानूभूति और अपने पन से देखने लगे स्त्री विमर्श ने स्त्रियों को और अधिक अधिकार दिलाया और आदिवासी अपने गौरव और अधिकारों को और मजबूत कर पाए। 


यदि दिव्यांग विमर्श साहित्य का हिस्सा हो जाए तो दिव्यांगो को समाजिक स्वीकार्यता और सहानुभूति प्राप्त होगी लोग उन्हें उनकी शारीरिक कमियों से उपर उठकर देखेंगे जैसे आज धीरे-धीरे ही सही दलितों को उनकी जाति से उपर उठकर देखा जा रहा है। मुझे बहुत आशा है कि जब दिव्यांग विमर्श साहित्य कि मुख्य धारा का हिस्सा हो जाएगा तो धीरे धीरे ही सही हर गूंगे बहरे दिव्यांग को पागल नहीं समझेंगे मेरे जैसे किसी दृष्टिबाधित व्यक्ति को अंधा, फूटा कैमरा या डबल बैटरी नहीं कहेंगे।

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