दिव्यांगता और टेक्नालॉजी


जीवन का लगभग तीन चौथाई हिस्सा उन संसाधनों को इकट्ठा करने के प्रयास में बीतता है जो यदि उसे ना भी मिले तब भी उसका जीवन प्रकृति पर आश्रित रहते हूए सुचारू रूप से चल सकता है जैसे यदि किसी व्यक्ति के पास साइकिल नहीं है तो भी वो अपने पैरों पर चलकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकता है पर वो अपने साथी को साइकिल पर सवार होकर कहीं जाते हुए देखता है तो स्वयं के लिए भी एक सायकिल की इच्छा करता है और उसे प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करता है।


दिव्यांगता क्या है

जब कोई व्यक्ति अपनी किसी जन्मजात शारिरिक या मानसिक कमी या जीवन के किसी हिस्से में किसी हादसे या अप्रिय घटना के कारण उत्पन्न हुई स्थाई शारिरिक या मानसिक कभी के कारण अपने जीवन के कार्यों का सुचारु रूप से समाधान नहीं कर पाता या अपने जीवन कि मूलभूत जरुरतें पूरी नहीं कर पाता तो उसे हम दिव्यांगता कहते हैं। दिव्यांग व्यक्ति के जीवन का संघर्ष अतिरिक्त सुविधाएं या वस्तुएं जुटाना ना होकर अपने जीवन कि मूलभूत सुविधाओं को प्राप्त करने को लेकर है जैसे खाने के लिए भरपेट रोटी, तन ढकने के लिए कपड़ा और रहने के लिए मकान ,पर यह भी कहना उचित होगा कि सभी दिव्यांग एक समान आर्थिक स्थिति में नहीं हैं तो उनके संघर्ष भी अलग-अलग हैं पर ध्यातव्य बात ये है कि चाहे उनके संघर्ष एक समान ना हो लेकिन दिव्यांगता से उत्पन्न अभाव सब के एक समान ही हैं जैसे आंखों से दिव्यांग को ना देख पाने कि कमी एक समान महसूस होगी चाहे वो महल में रह रहा हो या झोपड़ी में। 


तकनीकी और दिव्यांगता 

वर्तमान समय का समाज विभिन्न प्रकार कि तकनीकों से लदा हुआ है जीवन का ऐसा कोई पहलू नहीं है जिसे तकनीकी सिधे तौर पर प्रभावित ना करती हो। आपस में बात करना इंसानों कि जरुरत है और उसके लिए मोबाइल फोन हर किसी के लिए उपलब्ध है पर हम ये बात सामान्य लोगों के संदर्भ में कह सकते हैं पर क्या यह तकनीक दिव्यांगो के लिए भी है यह सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न है? |


दिव्यांगो के लिए वरदान तकनीकी 

यदि सावधानी से परखा जाए तो वर्तमान समय कि बहुत सी तकनीकी दिव्यागो के लिए वरदान साबित हो सकती हैं और हो ही रहीं हैं जैसे हाथ पैरों से दिव्यांगो के लिए सिंथेटिक हाथ पैर, आवागमन के लिए इलेक्ट्रॉनिक ट्राई साइकिल बोल ना पाने वालों के लिए स्पिच रिकागनिस ना देख पाने वाले दिव्यांगो के लिए ब्रेल लिपि आदि ऐसी सैकड़ों तकनीकी दिव्यागो के जीवन को प्रभावित कर रहीं हैं। सही मायने में देखा जाए तो यदि तकनीकी वहनीय बनाई जाए तो यह दिव्यांगो के लिए वरदान है और एक जिम्मेदारी समाज सरकार और स्वयं दिव्यांगो को मिलकर उठानी पड़ेगी वो है ज्यादा से ज्यादा दिव्यांगो को इन तमाम तकनीकों से अवगत कराने तथा उन्हें उचित प्रशिक्षण प्रदान कराकर उन्हें इससे जोड़ने की। तकनीकी का सबसे बड़ा और सार्थक उपयोग दिव्यांगो का कल्याण ही होगा।

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