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दिव्यांगता और टेक्नालॉजी

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जीवन का लगभग तीन चौथाई हिस्सा उन संसाधनों को इकट्ठा करने के प्रयास में बीतता है जो यदि उसे ना भी मिले तब भी उसका जीवन प्रकृति पर आश्रित रहते हूए सुचारू रूप से चल सकता है जैसे यदि किसी व्यक्ति के पास साइकिल नहीं है तो भी वो अपने पैरों पर चलकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकता है पर वो अपने साथी को साइकिल पर सवार होकर कहीं जाते हुए देखता है तो स्वयं के लिए भी एक सायकिल की इच्छा करता है और उसे प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करता है। दिव्यांगता क्या है जब कोई व्यक्ति अपनी किसी जन्मजात शारिरिक या मानसिक कमी या जीवन के किसी हिस्से में किसी हादसे या अप्रिय घटना के कारण उत्पन्न हुई स्थाई शारिरिक या मानसिक कभी के कारण अपने जीवन के कार्यों का सुचारु रूप से समाधान नहीं कर पाता या अपने जीवन कि मूलभूत जरुरतें पूरी नहीं कर पाता तो उसे हम दिव्यांगता कहते हैं। दिव्यांग व्यक्ति के जीवन का संघर्ष अतिरिक्त सुविधाएं या वस्तुएं जुटाना ना होकर अपने जीवन कि मूलभूत सुविधाओं को प्राप्त करने को लेकर है जैसे खाने के लिए भरपेट रोटी, तन ढकने के लिए कपड़ा और रहने के लिए मकान ,पर यह भी कहना उचित होगा कि सभी दि...

हिंदी साहित्य में दिव्यांग विमर्श की अनुपस्थिति और उसके प्रभाव।

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सभी मेरे दिव्यांग मित्रों को दिव्यांग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। हिंदी साहित्य का विद्यार्थी और एक दिव्यांग होने के नाते जब भी मैं हिन्दी साहित्य का अध्धयन करता हूं तो कुछ प्रश्न मुझे लगातार बेचैन करते हैं और मैं इनके जवाब तलाशने का प्रयास करता हूं।  जब हम हिन्दी साहित्य को देखते हैं तो पाते हैं कि अब तक इसमें दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श और अल्पसंख्य विमर्श सम्मिलित किया जा चुका है लेकिन अब तक इसमें दिव्यांग विमर्श सम्मिलित नहीं किया गया। आखिर क्यों?, क्या आज तक हिंदी भाषा में दिव्यांग लेखकों ने अपनी भावनाएं पीड़ा दुखों सामाजिक तिरस्कार आर्थिक अभाव आदि दिव्यांग विषयों पर रचनाएं नहीं की, जवाब है रचनाएं की गई हैं और ये रचनाएं हजारों में हैं। अब प्रश्न उठता है कि तो फिर दिव्यांग विमर्श साहित्य कि मुख्य धारा का हिस्सा क्यों नहीं बना अभी तक तो मुझे लगता है कि अभी तक दिव्यांग रचनाओं ने एक जुट होकर कोई आंदोलन नहीं प्रारंभ किया जिस तरह से दलित लेखकों ने किया था।  अब यदि बात की जाए की साहित्य की मुख्य धारा में दिव्यांग विमर्श के ना होने से क्या फर्क पड़ता है आखिर आरक्षण...