कविता, पांव से लिखती है वो
पांव से लिखती है वो
अपने हर सपने को
कागज़ पर
उकेरती है अपनी
समानता की काल्पनिक दुनिया
जन्म से ही
हाथ नहीं है उसके पास
मगर वो नहीं मानी
इस सच्चाई को
कि हाथ से ही
तकदीर लिखीं जा जाती है
और उसने अपनी ज़िद में पांवों को हाथ बना लिया
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