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कविता, हाथों से चलकर

 कोई कितना बड़ा जिद्दी हो सकता है  ये मैंने तब सोचा था  जब उसे अपने कालेज में देखा था  वो अपनी शारीरिक असमर्थता को धता बताती थी  आज लोग अपने पांव पर चलकर मंदिर भी नहीं जाते  वो बारह किलोमीटर हाथों से चलकर  महाविद्यालय आती थी ज्ञानार्जन का ऐसा चाव देखकर  मैं तो हतप्रद रहता था  सपनों को देखने का ये हौसला  कहां से उसमें आता था  यही ख्याल मेरे मन को  सदैव हर्षित गर्वित और अचंभित कर जाता था

कविता, पांव से लिखती है वो

 पांव से लिखती है वो  अपने हर सपने को  कागज़ पर  उकेरती है अपनी  समानता की काल्पनिक दुनिया  जन्म से ही  हाथ नहीं है उसके पास  मगर वो नहीं मानी  इस सच्चाई को  कि हाथ से ही  तकदीर लिखीं जा जाती है  और उसने अपनी ज़िद में पांवों को हाथ बना लिया

दिव्यांगता और टेक्नालॉजी

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जीवन का लगभग तीन चौथाई हिस्सा उन संसाधनों को इकट्ठा करने के प्रयास में बीतता है जो यदि उसे ना भी मिले तब भी उसका जीवन प्रकृति पर आश्रित रहते हूए सुचारू रूप से चल सकता है जैसे यदि किसी व्यक्ति के पास साइकिल नहीं है तो भी वो अपने पैरों पर चलकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर जा सकता है पर वो अपने साथी को साइकिल पर सवार होकर कहीं जाते हुए देखता है तो स्वयं के लिए भी एक सायकिल की इच्छा करता है और उसे प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करता है। दिव्यांगता क्या है जब कोई व्यक्ति अपनी किसी जन्मजात शारिरिक या मानसिक कमी या जीवन के किसी हिस्से में किसी हादसे या अप्रिय घटना के कारण उत्पन्न हुई स्थाई शारिरिक या मानसिक कभी के कारण अपने जीवन के कार्यों का सुचारु रूप से समाधान नहीं कर पाता या अपने जीवन कि मूलभूत जरुरतें पूरी नहीं कर पाता तो उसे हम दिव्यांगता कहते हैं। दिव्यांग व्यक्ति के जीवन का संघर्ष अतिरिक्त सुविधाएं या वस्तुएं जुटाना ना होकर अपने जीवन कि मूलभूत सुविधाओं को प्राप्त करने को लेकर है जैसे खाने के लिए भरपेट रोटी, तन ढकने के लिए कपड़ा और रहने के लिए मकान ,पर यह भी कहना उचित होगा कि सभी दि...

हिंदी साहित्य में दिव्यांग विमर्श की अनुपस्थिति और उसके प्रभाव।

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सभी मेरे दिव्यांग मित्रों को दिव्यांग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। हिंदी साहित्य का विद्यार्थी और एक दिव्यांग होने के नाते जब भी मैं हिन्दी साहित्य का अध्धयन करता हूं तो कुछ प्रश्न मुझे लगातार बेचैन करते हैं और मैं इनके जवाब तलाशने का प्रयास करता हूं।  जब हम हिन्दी साहित्य को देखते हैं तो पाते हैं कि अब तक इसमें दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श और अल्पसंख्य विमर्श सम्मिलित किया जा चुका है लेकिन अब तक इसमें दिव्यांग विमर्श सम्मिलित नहीं किया गया। आखिर क्यों?, क्या आज तक हिंदी भाषा में दिव्यांग लेखकों ने अपनी भावनाएं पीड़ा दुखों सामाजिक तिरस्कार आर्थिक अभाव आदि दिव्यांग विषयों पर रचनाएं नहीं की, जवाब है रचनाएं की गई हैं और ये रचनाएं हजारों में हैं। अब प्रश्न उठता है कि तो फिर दिव्यांग विमर्श साहित्य कि मुख्य धारा का हिस्सा क्यों नहीं बना अभी तक तो मुझे लगता है कि अभी तक दिव्यांग रचनाओं ने एक जुट होकर कोई आंदोलन नहीं प्रारंभ किया जिस तरह से दलित लेखकों ने किया था।  अब यदि बात की जाए की साहित्य की मुख्य धारा में दिव्यांग विमर्श के ना होने से क्या फर्क पड़ता है आखिर आरक्षण...

देश में दिव्यांगो को मिलने वाले आरक्षण और उसके प्रभाव पर एक विस्तृत चर्चा

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स्वयं एक दिव्यांग होने के नाते मैं देश मे केन्द्र सरकार के द्वारा और अपने गृह राज्य मध्यप्रदेश में दिव्यांगो को मिलने वाले आरक्षण और उसके प्रभाव पर एक विचार करना चाहता हूं।    भारत में दिव्यांगजनों (Persons with Disabilities) की जनसंख्या और उन्हें मिलने वाले आरक्षण से जुड़ी जानकारी आधिकारिक आंकड़ों और नियमों के आधार पर यह है। 1. भारत में दिव्यांगजनों की जनसंख्या (Population) भारत में दिव्यांगजनों की जनसंख्या का सबसे प्रामाणिक स्रोत 2011 की जनगणना (Census 2011) है, क्योंकि 2021 की जनगणना के आंकड़े अभी सार्वजनिक नहीं हुए हैं।  * कुल जनसंख्या: लगभग 2.68 करोड़।  * प्रतिशत: यह भारत की कुल आबादी का 2.21% है।  * पुरुष: 1.5 करोड़ (लगभग 56%)  * महिलाएं: 1.18 करोड़ (लगभग 44%)  * ग्रामीण बनाम शहरी: लगभग 69% दिव्यांगजन ग्रामीण क्षेत्रों में रहते हैं। > नोट: विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले 13-14 वर्षों में यह संख्या बढ़ी है, लेकिन आधिकारिक तौर पर हम अभी भी 2011 के आंकड़ों का ही संदर्भ देते हैं।    अनुमान के अनुसार वर्तमान में भारत मे दिव्यांगो कि जनसंख्...