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कविता, हाथों से चलकर

 कोई कितना बड़ा जिद्दी हो सकता है  ये मैंने तब सोचा था  जब उसे अपने कालेज में देखा था  वो अपनी शारीरिक असमर्थता को धता बताती थी  आज लोग अपने पांव पर चलकर मंदिर भी नहीं जाते  वो बारह किलोमीटर हाथों से चलकर  महाविद्यालय आती थी ज्ञानार्जन का ऐसा चाव देखकर  मैं तो हतप्रद रहता था  सपनों को देखने का ये हौसला  कहां से उसमें आता था  यही ख्याल मेरे मन को  सदैव हर्षित गर्वित और अचंभित कर जाता था

कविता, पांव से लिखती है वो

 पांव से लिखती है वो  अपने हर सपने को  कागज़ पर  उकेरती है अपनी  समानता की काल्पनिक दुनिया  जन्म से ही  हाथ नहीं है उसके पास  मगर वो नहीं मानी  इस सच्चाई को  कि हाथ से ही  तकदीर लिखीं जा जाती है  और उसने अपनी ज़िद में पांवों को हाथ बना लिया